मेरी हिन्‍दी कविता

10 04 2007

भावना शब्‍द के पंखों पे
सवार होकर जिन्‍दगी के
आंगन तक आती हैं.

बिल्‍कुल भोर के उजाले सी,
सिमट कर आंचल में छुप जाती हैं.

कविता जननी बनकर
धुधंलके में सिमट जाती हैं.

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नभ छूता अवनि का (छायावादी कविता)

8 04 2007

नभ छूता अवनि का
लगता तुम हो बैठे
रूप के आसन में
अपनी छवि बिखेरे ।

आसमान में नीले-नीले
चांद और सितारे
चमकते अनुपम
हैं प्रकाश कण तुम्हारे ।

अनोखी पलके तुम्हारी
गिरती दिन-रात सी
उड़ रहा समय है
सुख दु:ख के पार में
अपने पांव पसारे
चूम-चूम बन पहाड़,
बह रहे नद नाले
गोद में मोद भरे
खेत भी झूम रहे
ले फसल हरी भरी
पेड़ भी फूल रहे ।

लिपटी लता वल्करी,

लगता तुम हो हंस रहे ।

ek chhayavadi kavita (read some where)





पचरंग पचरंग साजे ओ कंकालिन मैय्या

6 04 2007

 पचरंग पचरंग साजे ओ कंकालिन मैय्या

हे दुख हरनो,

हे सुख करनो

जग तारे बर आए ओ कंकालिन मैय्या पचरंग पचरंग

सेत सेत तोर ककनी बनुरिया,सेत पटा तुम्हारे

सेत हावय तोर गल के सुतिया उरू गज मुता हारे हे दुख ………..

हरे हरे तोर हाथ के चुरिया, हरे गले के पोत

हरे हावय तोर माथ के टिकुली, बरे सुरूज के जोत हे दुख ………..

पिंवरी साज सजे चोलियन में पिंवरी कान के ढार

पिंवरी हाबय तोर नाक नथुनिया रहे औट पर छाये हे दुख ………..

कारी साज सजे चोलियन में, नवदन काजर ओजे

कारी पिंवरी गक्षक बाली, सिर के शोभा बाली हे दुख ……….

लाली लाल लहर के लहंगा, लाली चोली तुम्हारे

पान खत मुह लाल भवानी, सिर के सेन्दुर लाले हे दुख ……….

माता कंकाली तोर जस गावन, जै जै बोल तुम्हारे

बालक बरूवा कछु नहि जानव, केवल सरन तुम्हारे हे दुख ……….

आर.सी. फरिकार बल्लूउर्फ बल्लू फरिकार  रचित